Saturday, October 5, 2013

सुंदरता

सुंदरता

वो बहुत सुंदर थी,
पता नहीं उसे यह,
पता था या नही..

तभी किसी ने उसे
(और) सुंदर होने का उपाय बताया...

अब उसके कपड़े घटते जा रहे थे
चेहरे पर मेक-अप  बढ़ते जा रहे थे।

किसी ने उसे नंगई को सुंदरता समझा दिया था

Wednesday, October 2, 2013

यह भी संभव है

इधर के वर्षों में बिहार की राजनीति का दो सबसे बड़ा उलटफेर -- नितीश का बीजेपी से सम्बन्ध तोड़ना और लालू यादव के जेल जाने को माना जा सकता है। इन दोनो घटनाओं ने बिहार की राजनीतिक परिस्थितियों को कुछ ऐसा बदला है कि बड़े बड़े विश्लेषक भी कुछ साफ नहीं कह पा रहे हैं।


बहरहाल आइए देखते हैं क्या है बिहार की राजनीति की उलझनें । कौन से पेंच हैं जिसे विश्लेषक भी नहीं समझ पा रहे हैं

नितीश धीरे-धीरे कांग्रेस के नजदीक जाते दिख रहे हैं, ये अलग बात है कि जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव कांग्रेस विरोध का झंडा उतनी ही मजबूती से थामे हुए हैं।

पिछले चुनाव तक करारी हार के बाद भी लालू का एमवाई समीकरण कहीं दरकता नहीं लगा था, केवल विरोधी मत बीजेपी-जेडीयू की तरफ एक तरफा चली गई।

क्या करेंगे मुसलमान : पिछले दो दशकों से लालू यादव मुसलमानों का वोट एकतरफा पाते रहे हैं। लेकिन अब बदली हुई परीस्थितयों में वे लालू के साथ बने रहेंगे, यह एक बड़ा सबाल है। दोस्त से दुश्मन बने लालू और नितीश की पार्टी अगर इसी वोट के लिए राज्य में उलझते दिखे तो बड़ी बात नहीं होगी। 
 
नरेन्द्र मोदी के नाम पर नितीश बीजेपी के साथ अपने 17 साल पूराने संबंधों को तिलांजली दे चुके हैं। इधर कांग्रेस भी लालू से दूरी बना रही है, राहुल गांधी दागी नेताओं को बचानेवाले अध्यादेश को फाड़ने की बात से यह जता चुके हैं। लालू यादव के जेल जाने के बाद कांग्रेसी नेताओं के बयान से भी यह लगता है कि कांग्रेस का ऑफिशियल लाइन अब लालू से दूरी बनाना है।

वहीं नीतीश कुमार का कांग्रेस से बढ़ता नयन मटक्का भी अब छिपा हुआ नहीं है। आनेवाले चुनाव में जबकि नरेन्द्र मोदी के मुकाबले लालू यादव को कमजोर पड़ता देख, मुसलमान कांग्रेस को मजबूत करने के लिए नितीश कुमार का हाथ थाम सकते हैं।

राजद का समीकरण : लालू आज भी यादवों के नीर्विवाद नेता है। यादव वोट लालू की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल से दूर हो जाए, इसकी संभावना नगण्य ही है। लेकिन केन्द्र की बदलती राजनीति की वजह से लालू यादव की पार्टी राजद को मुस्लिम वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। 'एमवाई' में से 'एम' के छिटकने से राजद को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। 
 
इसके पास रघुवंश प्रसाद सिंह, प्रभुनाथ सिहं, जगदानंद सिंह जैसे अगड़ी जातियों के नेता तो हैं लेकिन इनका नाम राजद को इनके प्रभावक्षेत्र से अलग इलाकों में कोई फायदा पहुंचा दे इसकी संभावना कम ही है।

रामविलास पासवान : लालू के साथ अभी तो खड़े हैं रामविलास पासवान लेकिन जिस तरह का उनका रिकॉर्ड रहा है और जिस तरह से ये अपने पुत्र को अपनी विरासत का हस्तांतरण करने में व्यस्त हैं, कब यह लालू का साथ छोड़ दें कुछ कहा नहीं जा सकता। एक अच्छा मौका इनके सामने आने दीजिए, रामविलास पासवान का स्टैंड साफ हो जाएगा।

सिर्फ अपने पेटेंट समर्थक जाति के बल पर चुनाव नहीं जीता जा सकता है, यह बात रामविलास अब समझ चुके हैं इसलिए इनका जोड़ इस बात पर रहेगा कि किसी मजबूत पार्टी के साथ समीकरण बन जाए। इनके दलित वोटों में सेंध लगाने के लिए नितीश जहां महादलित राजनीति पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं, वहीं एक मायावति फैक्टर भी है।

 बीएसपी प्रत्येक अगले चुनाव में अपना वोट प्रतिशत बढ़ाते जा रही है। रामविलास, नितीश को मायावति के बढ़ते वोट प्रतिशत का नुकसान हो सकता है।

नीतीश कुमार : संकट की घड़ी नितीश कुमार के लिए है। पार्टी सत्ता में है, इसे सत्ता में बनाए रखना बड़ी चुनौती है। जिस तरह से अपने साथियों को नितीश ने एक-एक कर ठिकाने लगाया उसका असर आने वाले समय में देखा जा सकता है। बीजेपी से अलग होने पर पार्टी में कैसी झुंझलाहट थी इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि नितीश को धर्मनिर्पेक्ष राजनीति का प्रतीक बनाने का प्रयास करने वाले शिवानंद तिवारी को पार्टी ने तुरत बाद अलग-थलग कर दिया। अब बेचारे को कोई पूछता भी नहीं। आपको याद हो कि यह शिवानंद तिवारी ही थे जिन्होने जेडीयू और बीजेपी के बीच खाई बनाने का काम किया।

जाति पर आधारित बिहार की राजनीति में नितीश कुमार के पास किसी विशेष जाति समूह का समर्थन नहीं है। बिहार में लालू के समय से बीजेपी विपक्षी ताकत का प्रतीक रही थी। लालू से अलग होने के बाद नितीश-जॉर्ज की जोड़ी संघर्ष तो कर रही थी लेकिन लालू को असली टक्कड़ बीजेपी से मिलता था।

बहरहाल केन्द्र में शासन करने की गरज से बीजेपी ने नितीश को आगे कर दिया। लालू की नौटंकियों से त्रस्त अगड़ी जातियां और मध्यम वर्ग के लोग बीजेपी के मार्फद बीजेपी-जेडीयू में ट्रान्सफर हो गया। नितीश के दरबारियों ने इसे जेडीयू का पॉकेट वोट बैंक करार दे दिया। इससे किसी को इनकार नहीं होना चाहिए कि नितीश ने बदलाव लाया है। लेकिन आम जनता बेहतर चाहती है और कोई जरुरी नहीं कि इसके लिए वो एक पार्टी के पीछे हमेशा खड़ी रहे। यह लालू विरोध की हवा, जातियों का समीकरण और कुछ नितीश के कार्य भी थे जिससे एनडीए गठबंधन और मजबूत होता चला गया। 
 
अब जबकि बीजेपी सरकार से अलग हो गइ है, नितीश कुमार को अगड़ी जातियां, मध्यमवर्ग, आदि का वोट खोने का डर सता रहा है। वे कुर्मी, कोइरी, और मुसलमान वोट को अपना कह सकते हैं जिसके लिए कई वर्षों से कोशिश करते रहे हैं। हां महादलित वोट जिसके लिए वो सत्ता में आने के बाद से ही लगातार प्रयास कर रहे हैं, कितना उनके साथ खड़ा होता है यह देखने की बात होगी। 
 
कांग्रेस : पिछले कई चुनावों की तरह बिहार में कांग्रेस एक बार फिर पाने-खोने के मायाजाल से ऊपर है। पार्टी के पास खोने के लिए राज्य में कुछ नहीं है, अपने दम पर कुछ पा ले इसकी भी संभावना भी कम है। ऐसे में पार्टी नितीश पर दांव लगा सकती है कि कम-से-कम जरुरत पड़ने पर नितीश के सांसदों का सहयोग केन्द्र में लिया जा सके। यह बात दीगर है कि नितीश के सांसद आने वाले समय में शायद ही नितीश की सुने। क्योंकि नितीश ने जिस तरह से पार्टी और सरकार को मनमाने तरीके से चलाया उससे जेडीयू सांसद बहुत खुश नहीं है। आनेवाले समय में अगर एनडीए की तरफ कुछ संभावना बनती है तो कोई आश्चर्य नहीं अगर नितीश के सांसद शरद के साथ फिर से एनडीए में जा मिलें।


Monday, September 30, 2013

अंदाज-ए-लालू

बीत गये संभालने के दिन
  









कुछ दिखता क्यों नहीं

















कुछ पाने के लिए कुछ खिलाना पड़ता है

एक बार चक्र हाथ में आया तो बड़े-बड़े चितपटांग हो गये

मैं ही हू, धोखा मत खाना

कभी हम दोस्त थे




ये हमेशा मेरा कहा मानते थे







































और जब चक्र गया तो लालटेन आ गया





















मैडम तो बस नाम के लिए मुखिया थीं


 ग्वाला हूं, यह तो मेरा पहला काम है

सब राजनीति है














मेरे अच्छे दिन





वीपी सिंह के साथ



मेरे रंग हजार
कुर्ताफाड़ होली देश ही नहीं विदेशों में फी फेमस था



कुछ कहना है क्या???















सब विरोधियों की चाल है। मेरा कुछ नहीं होगा
कार्यकर्ताओं में जोश भरना है
परिवार को भी समय चाहिए
यह राजनीति नहीं है




























फिट है बॉस






ये ना सोचा था कभी




क्या लालू राजनीति का पटाक्षेप हो गया? इस पर फिर कभी....









Thursday, September 19, 2013

तुम तूफान समझ पाओगे

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?
गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम, उड़ जाओगे !
तुम तूफान समझ पाओगे ?

हरिवंशराय बच्चन


Sunday, July 15, 2012

कांग्रेस को महंगे साबित होंगे प्रणब !!!



अगर कुछ बड़ा उलट फेर नहीं हुआ तो प्रणब मुखर्जी का देश का प्रथम नागरिक बनना तकरीबन तय है। पचपन फीसदी से अधिक वोट उनके समर्थन में है। यूपीए गठबंधन के साथ ही कुछ बामपंथी और एनडीए के कुछ घटक दलों ने भी उन्हें समर्थन देने की घोषणा कर दी है।


एक टीवी इंटर्व्यू के दौरान रिपोर्टर ने उनसे सवाल किया कि अब वो राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं तो क्या उनकी कोई ऐसी ख्वाहिश है जो पूरी ना हुई हो....मंद मंद मुस्कुराते हुए दादा ने कहा......'सभी आकांक्षाएं कभी पूरी नहीं हो पातीं'. यह कहते वक्त उनके दिमाग में कही न कहीं उस कुर्सी की तस्वीर जरुर रही होगी जिसपर 2004 से मनमोहन सिहं लगातार बैठे हैं।

इंदिरा गांधी के समय से ही सरकार और पार्टी में प्रणब की हैसियत नम्बर दो की रही है। नम्बर दो रहने के दौरान भी काम वो नम्बर एक का ही करते रहे। लेकिन नम्बर एक कभी नहीं बन पाए। जाहिर है इस बात का मलाल तो कहीं न कहीं उनके जहन में जरुर होगा। 2004 से सरकार और पार्टी के संगट मोचक बने रहे। चाहे पार्टी में सकट हो या फिर सरकार में....हालात जब भी बेकाबू होते तो प्रणब बाबू को याद किया जाता । तकरीबन तीन दर्जन समितियों के या तो अध्यक्ष रहे या फिर सदस्य।

पांच दशकों तक उनकी छवि एक निर्विवाद नेता की रही है। जिसने पार्टी के लिए अपना पूरा जीवन दे दिया। प्रणब मुखर्जी को जब राष्ट्रपति बनाने की बात चल रही थी तो कांग्रेस का बयान आया था कि पार्टी उनको छो़ड़ नहीं सकती, क्योंकि पार्टी और सरकार में उनकी खाली जगह को भरने के लिए दूसरा कोई नहीं है। यह सवाल लेकिन अभी बचा हुआ है कि अगर ममता और मुलायन ने अपने उम्मीदवारों को नाम आगे नहीं बढ़ाया होता तो शायद कांग्रेस कभी राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब मुखर्जी के नाम पर सहमत हो पाती या नहीं.

एक व्यक्ति जब इतना अहम है तो सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उसे क्यों नहीं दी गई? यह सबाल उठाना कहीं से भी गलत नहीं है। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रणब मुखर्जी ने जाने या अनजाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे कर दिया था। क्योंकि कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद गांधी परिवार के लिए आरक्षित है इसलिए उनकी विश्वसनीयता और बफादारी संदिग्ध हो गई। और इस वजह से प्रणब दा सबसे महत्वपूर्ण होते हुए भी सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी पर नहीं बैठ पाए..क्या प्रणब दा इन बातों को नहीं समझ पा रहे होंगे?????

प्रणब मुखर्जी हमेशा से कांग्रेस के वफादार रहे हैं। हालाकि एक बार उन्होने कांग्रेस से अलग हो कर अपनी पार्टी भी बनाई थी.....लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस में लौट आए। राजनीति में आने का मकदस सेवा नहीं सत्ता होता है। (इसे आप अलग अलग रुप में पढ़ और समझ सकते हैं). प्रणब दा सत्ता में रहे लेकन शीर्ष पर कभी नहीं पहुंच पाए। लेकन अब जबकि वो राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं.....तो क्या प्रधानमंत्री नहीं बन पाने का बदला वो कांग्रेस ले लेंगे???????

कांग्रेस की तरफ से राष्ट्रपति पद के लिए नामांकित होने के बाद से प्रणब दा एक बात कहते आए हैं... कि राष्ट्रपति बने जाने के बाद उन्हें संवैधानिक मर्यादाओं के तहत काम करना होगा। प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर ही सही......उनका इस तरह का कहना कहीं ना कहीं कांग्रेस या सहयोगियों को यह संदेश ही माना जाएगा कि उन्हें कांग्रेस का एजेंट समझने की भूल कोई (कांग्रेस ?) ना करे। सब जानते हैं कि राष्ट्रपति का पद सेवैधानिक प्रमुख का होता है.... लेकिन जैसा कि पूर्व राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमण ने अपनी किताब 'माय प्रेशिडेंशियल इयर्स' में लिखा है कि 'राष्ट्रपति का दफ्तर इमरजेंसी लाइट की तरह होता है जो सामान्य काल में निष्क्रिय होता है लेकिन संगट की घड़ी में सक्रिय हो जाता है।'


ऐसे संकट की घड़ी में प्रणब मुखर्जी अगर निष्पक्ष काम करने लगें तो कांग्रेस के लिए वो संकट का सबब बन सकते हैं। नाम मात्र का प्रमुख होने का बावजूद राष्ट्रपति कई मसलों पर अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाया करता है। कहा जाता है कि तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने एक बार राजीव गांधी की सरकार को बर्खास्त करने की पूरी तैयारी कर ली थी।

प्रणब दा अपने राजनैतिक करियर और उम्र के उस मकाम पर पहुंच गये हैं जहां उनके लिए अब कुछ खास पाने या खोने को बचा नहीं है..सिवाय..भारतीय राजनीति का इतिहास में अपना नाम एक सर्वमान्य नेता के तौर पर दर्ज करवाने के। बहुत आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर प्रणब मुखर्जी एक कांग्रेसी के कद से बाहर निकल कर फैसला लेने लगें। अगर वो अपनी दलीय पृष्ठभूमि से बाहर निकल कर फैसला लेना शुरु कर देते हैं...तो जाहिर हैं कांग्रेस को दर्द तो होगा ही।

Tuesday, March 20, 2012

बस सरकार ना गिराइए


केन्द्र की सरकार किरने की चिंता मंत्रियों को बहुत सता रही है। पिछले दिनों बिहार के सांसदों 
का एक समूह भाजपा नेता शाहनवाज हुसैन के नेतृत्व में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के मसले
 पर केन्द्रिय मंत्री जयराम रमेश से दिल्ली में मिला।

बैठक के बाद जब सांसदगण जयराम रमेश के साथ बातचीत करते बाहर आ रहे थे तो बिहार के
 कुछ समाचार चैनलों के रिपोर्टर्स ने उनको घेर लिया। ऐसा कम देखा जाता है कि विपक्षी सदस्य 
मंत्री के काम से संतुष्ट दिखें। लेकिन यहां तो मामला उल्टा था। कैमरे के सामने ही विपक्षी सांसद
 ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की तारिफों के पुल बांधने लगे। 

तारीफ से भावुक हो जयराम ने भी आश्वासन दे दिया कि आपका काम होता रहेगा...और इसके आगे 
यह भी जोड़ दिया कि 'बस सरकान ना गिराइए।' जाहिर है सरकार गिरने की चिंता आजकल
 निंद नहीं होने दे रही है। 

बहरहाल एक बार मंत्रीजी फिसले तो फिर विपक्षी सांसद लपक पड़े। दरभंगा से भाजपा के सांसद
किर्ती आजाद ने कहा अगर आपकी सरकार गिरेगी तो हम आपको अपने पास रख लेंगे। जाहिर 
है जयराम रमेश के पास झेंपने के अलावे और कोइ उपाय नहीं बचा था। हाथ से मुंह ढ़कते 
कैमरे के सामने से भागे जयराम। 

Friday, September 16, 2011

A Chinese Village


Below is a joke on Chinese economy that is currently being circulated widely on Chinese social networks: 

There is a village that only has one restaurant. Everyone in the village has to eat at that restaurant. ?

Villager: Why cant we have more than one restaurant??
Waiter: Our village is in a stage of development where more than one restaurant can lead to chaos, so we only have one restaurant. ?

Villager: But the food here is really not good!?
Waiter: Our restaurant has only been developing for a short time. Even if the food tasted worse than this, at least its our own food! ?

Villager: But cant it be a little cheaper??
Waiter: That would not suit the conditions of our village; the restaurant also needs to develop.?
?
Villager: But the employees of the restaurant are all driving Mercedes Benz cars!
Waiter: To ensure fair and uncorrupt staff, you need to pay them high salaries.?

Villager: But last year, you lent all the profits of the restaurant to another village.?
Waiter: This is the village policy, you dont need to worry about it. ?

Villager: I heard that the guy in charge of purchasing took all the money for buying vegetables and ran away to another village. ?
Waiter: That type of employee is very rare. ?

Villager: What about that time when we found sand inside the steamed buns? ?
Waiter: Dont worry, we have already fired that chef, he didnt have the right qualifications. ?

Villager: So when weve got so many problems, why do you still hang up certificates of high quality? Why do you tell oursiders that everyone is eating so well? ?
Waiter: For whose interests are you speaking? What a waste that the village has raised you!?
?
Villager: The grain was grown by the peasant farmers, the restaurant was built by the workers, and the chef is one of us common people. ?
Waiter: Look at M village taking advantage of L village! M Village is really hegemonistic.?
?
Villager: I cant even get a decent meal, what do these other things have to do with me? Why dont other villages have all these problems we have here? ?
Waiter: Whenever you talk about yourself, you can only say only bad things, when you talk about others, you say everything is good. You village traitor!