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Tuesday, August 19, 2014

हरियाणा का चुनावी चौसर


संयोग से इन दिनों हरियाणा की राजनीति को नजदीक से देखने का मौका मिल रहा है...। तीन लालों- देवीलाल, वंशीलाल और भजनलाल- की इस धरती की राजनीति पहली बार इनकी विरासत से बाहर निकलने को आतुर दिख रही है...

अभी तक के जो समीकरण दिख रहे हैं... उसमें कांग्रेस तकरीबन सत्ता से खुद को बाहर मान कर चल रही है...। लोकसभा में मिली करारी मात ने पार्टी को बिल्कुल बिखेड़ कर रख दिया है... । हरियाणा कांग्रेस से एक के बाद एक अपना दामन छुड़ा रहे हैं...। नेताओं के पार्टी छोड़ने का सिलसिला लोकसभा चुनाव से ठीक पहले शुरू हो गया था जब राव इंद्रजीत सिंह ने हाथ को भाजपा का कमल थाम लिया था..। हरियाणा में एक कद्दावर नेता को तरस रही भाजपा के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी...। भाजपा में राव इंद्रजीत सिंह के शामिल होने का महत्व इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्ता में आने के बाद जहां पुराने नेता मंत्री पद की जुगत लगाने में भिड़े थे... तब राव इंद्रजीत सिंह को मोदी सरकार में आसानी से जगह मिल गई...। जगह ही नहीं मिली बल्कि उन्हें काफी महत्पूर्ण विभाग भी मिला।

पूर्व मंत्री या पूर्व विधायक जैसे नेताओं की बात छोड़ दें तो हरियाणा में भाजपा की दूसरी बड़ी उपलब्धि रही जींद इलाके से आने वाले कांग्रेस के कद्दावर जाट नेता चौधरी बीरेंद्र सिंह को तोड़ना। कांग्रेस में रहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर गराए चौधरी बीरेंद्र बहुत कोशिशों के बाद भी मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कुछ नहीं बिगा़ड़ पाए..10 जनपथ पर मजबूत पकड़ से हुड्डा कांग्रेस की राज्य राजनीति में अपराजेय बने रहे।


लोकसभा चुनाव में हार के बाद हुड्डा विरोधी खेमे ने तख्तापलट की नाकाम कोशिश की थी.. और फिर कोई चारा ना देख कांग्रेस से बाहर अपनी राह देखनी शुरू कर दी।।।।

वहीं ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला के जेल जाने के बाद से आईएनएलडी अभी तक संभल नहीं पाई है...। यूं तो भारतीय मतदाता नेताओं पर लगे आरोपों को ज्यादा भाव नहीं देती.. देती भी है तो जल्द भुला देती है.... लेकिन अभी जो परिदृश्य बन रहा है उसमें चौटाला की पार्टी की हालत बहुत अच्छी नहीं है...। टिकटों के बंटवारे के बाद से पार्टी में उबाल आया हुआ है..। दर्जनों नेता अभी तक पार्टी छोड़ दूसरे दरवाजों पर दस्तक दे चुके हैं...। ओमप्रकाश चौटाला खुद जेल से बाहर आ चुके हैं लेकिन कितने दिन बाहर रहेंगे इस पर संशय बरकरार है...

भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल.... कुलदीप बिश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस या हजकां
का भाजपा के साथ गठबंधन बना रहेगा इसकी संभावन अब कम ही है..। फिर भी हालात ऐसे हैं कि राज्य में हजकां और भाजपा की राजनीति को अलग-अलग करके अभी देखना मुश्किल लग रहा।
दरअसल भाजपा-हजकां के संबंध ऐसी करबट ले रहा है जो कम से कम भाजपा की राजनीति पर नजर रखनेवालों के लिए बिल्कुल नया है..। आपने भाजपा को कभी अपने गठबंधन सहयोगी के सामने गुर्राते देखा है..। नहीं...कभी नहीं...। लेकिन इस बार भाजपा बिश्नोई और उनकी पार्टी के सामने दहाड़ मार रही है..। और हजकां भीगी बिल्ली बनी गठबंधन बचाने की कोशिश में लगी पड़ी है।

दरअसल भाजपा की राजनीति में पिछले एक साल में काफी बड़ा बदलाव आया है...। यह पार्टी अब अपने संस्थापकों के हाथ से निकल चुकी है...। मोदी और शाह का अब ऐसा नेतृत्व है जिसने भाजपा में खेल के सारे नियम बदल कर रख दिए हैं...

याद कीजिए भाजपा के संबंध, नीतिश की पार्टी जेडीयू के साथ, नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी के साथ, ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ, जयललिया की पार्टी एआईएडीएमके के साथ.. या फि याद कीजिए दूसरी पार्टियों के साथ भाजपा के गठबंधन को...। इन दलों ने हमेशा से भाजपा पर अपनी मर्जी थोपी है..। यह महला ऐसा मौका है जब भाजपा गठबंधन को अपने हिसाब से चला रही है...

बिश्नोई के पास अकेले लड़ने पर कुछ नहीं बचेका..। यह बात उन्हें भी पता है..। भाजपा के साथ रहने पर 1) प्रदेश की सरकार में आने की संभावना बनी रहेगी और 2) केंद्र में भाजपा की सरकार का भी फायदा मिलने का चांस बना रहेगा...

लेकिन भाजपा का आत्मविश्वास इस कदर ऊंचाइयों पर है कि वो सोच रही है कि बिश्नोई से अलग हो कर भी वो विधानसभा चुनाव में आसान जीत हासिल कर लेगी...। साथ ही अगर खंडित जनादेश आता है तो भी उसके पास चौटाला या फिर बिश्नोई से हाथ मिलाने का ऑप्शन खुला रहेगा...
इसलीए भाजपा अभी हजकां की कोई परवाह नहीं कर रही है...

पीएस : हरियाणा की राजनीति के अलग-अलग रंग आपको आगे के पोस्ट में मिलते रहेंगे..