Monday, September 30, 2013

अंदाज-ए-लालू

बीत गये संभालने के दिन
  









कुछ दिखता क्यों नहीं

















कुछ पाने के लिए कुछ खिलाना पड़ता है

एक बार चक्र हाथ में आया तो बड़े-बड़े चितपटांग हो गये

मैं ही हू, धोखा मत खाना

कभी हम दोस्त थे




ये हमेशा मेरा कहा मानते थे







































और जब चक्र गया तो लालटेन आ गया





















मैडम तो बस नाम के लिए मुखिया थीं


 ग्वाला हूं, यह तो मेरा पहला काम है

सब राजनीति है














मेरे अच्छे दिन





वीपी सिंह के साथ



मेरे रंग हजार
कुर्ताफाड़ होली देश ही नहीं विदेशों में फी फेमस था



कुछ कहना है क्या???















सब विरोधियों की चाल है। मेरा कुछ नहीं होगा
कार्यकर्ताओं में जोश भरना है
परिवार को भी समय चाहिए
यह राजनीति नहीं है




























फिट है बॉस






ये ना सोचा था कभी




क्या लालू राजनीति का पटाक्षेप हो गया? इस पर फिर कभी....









Thursday, September 19, 2013

तुम तूफान समझ पाओगे

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता 'हरहर'--इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?
गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे ?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को ! हटो विहंगम, उड़ जाओगे !
तुम तूफान समझ पाओगे ?

हरिवंशराय बच्चन