Daily Horoscopes

Friday, November 3, 2017

क्या हुआ था उस रात!!! (1)

=> यह कहानी है उस रात की जिस  रात ओसामा बिन लादेन को अमेरिकन सील कमांडर ने पाकिस्तान के उसके घर मे घुस कर मारा <=



ब्लैक हॉक क्य्रू टीम के प्रमुख ने दरवाजा खोला। मैं उन्हें देख सकता था। नाइट वीजन चश्में से उनकी आंखें ढकी हुई थीं और उनकी एक उंगली इशारा करने के लिए उठी थी। मैंने आस-पास देखा, हमारी सील मेंम्बर्स हेलिकॉप्टर से इशारा दे रहे थे।
Twin Towers 

कैबिन में इंजन से निकल रही घर्राहट की आवाज भरी हुई थी। ब्लैक हॉक के ब्लेड्स के हवा में नाचने की आवाज को छोड़कर कुछ भी सुन पाना नामुमकिन था। सतह और अबोटाबाद शहर का मुआयना करने की कोशिश में जैसे ही मैं हेलिकॉप्टर से बाहर की ओर झुका, हवा का तेज थपेड़ा मुझे लगा।

कुछ डेढ़ घंटे पहले हमलोग दो MH-60 ब्लैक हॉक में सवार होकर अंधेरी रात में निकले थे। अफगानिस्तान के जलालाबाद बेस से पाकिस्तानी बॉर्डर की यह एक संक्षिप्त यात्रा थी। और फिर पाकिस्तान बोर्डर से एक घंटे की फ्लाइट हमारे उस लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जिसकी सैटेलाइट तस्वीरों को हम पिछले कई हफ्तों से खंगाल रहे थे। कॉकपिट से आ रही रौशनी को छोड़कर, कैबिन में घुप अंधेरा छाया था। मैं बांयी ओर दरवाजे से चिपका हुआ था, जगह इतनी कम कि ठीक से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। हेलिकॉप्टर का वजन कम करने के लिए कुर्सियां हटा दी गयी थीं। बैठने के लिए हमारे पास अब फ्लोर बचा था या कुछ छोटी कैम्प कुर्सियां जिन्हें हमने ऑपरेशन से पहले स्थानीय स्पोर्ट्स दुकान से खरीदी थीं।

कैबिन के किनारे से टिके-टिके मैंने दरवाजे से बाहर अपना पैर फैलाने की कोशिश की, ताकि उनमें खून का प्रवाह बना रहा। मेरे पैर बुरी तरह से जकड़े हुए थे, और वे सुन्न पड़ गए थे। मेरे साथ मेरे केबिन में और दूसरे हेलिकॉप्टर मे नेवल स्पेशल वॉरफेयर डेवलपमेंट ग्रुप से मेरे 23 टीममेट्स थे। इससे पहले भी इनके साथ मैं दर्जनों ऑपरेशन में शामिल हो चुका था। उनमें से कुछ को तो में दस या उससे भी अधिक वर्षों से जानता था। मैं उन सभी पर पूरी तरह विश्वास करता था। पांच मिनट पहले पूरा कैबिन जीवंत हो उठा था। हमने अपने हेलमेट्स पहने, रेडियो को जांचा और फिर अपने हथियारों पर आखिरी नजर मारी। मैं 60 पाउंड्स का गियर पहना था, जिसमें से प्रत्येक ग्राम विशेष उद्देश्यों के लिए सतर्कतापूर्वक चुना गया था।
Cover page of No Easy Day

हमारे स्कवेड्रन के सबसे अधिक अनुभवी लोगों में से इस टीम को चुना गया था। पिछले 48 घंटों में हमने अपने हथियारों और औजारों को कई बार चेक किया और इस तरह से अब हम अपने अभियान के लिए पूरी तरह से तैयार थे। यह एक ऐसा मिशन था जिसके लिए मैं उसी दिन से तैयार था जब सितंबर 11, 2001 को मैंने अपने ओकिनावा के बैरक में टीवी पर ट्विन टॉवर हमले का द़श्य देखा था।

मैं ट्रेनिंग से लौटा ही था और अपने रूम में जाते ही नजर टीवी पर गई। जहाज वर्ल्ड ट्रेड सेंटर से टकरा रहा था। मैने बिल्डिंग के दूसरी ओर से आग का गोला निकलते देखा, धूएं का गुब्बार बिल्डिंग से निकल रहा था।

घर में बैठे लाखों अमेरिकन्स की तरह, मैं अविश्वास की मुद्रा में इस हमले को देखता रहा। दिन के बांकि हिस्सों में मैं टीवी के सामने ही टिका रहा, और मेरा दिमाग यह समझने की कोशिश में लगा रहा कि टीवी में जो भी देखा क्या वो सच था। 


एक प्लेन क्रैश, दुर्घटना हो सकती है। टीवी न्यूज ने यह बता दिया कि दूसरे प्लेने के टकराते ही, मैने जो मतलब निकाला था, वो बिल्कुल सच था।

टावर से टकराता दूसरा प्लेन, बिना शक एक हमला था। ऐसा दुर्घटनावश नहीं हो सकता था। 11 सितंबर, 2001 को सील कमांडर के तौर पर मैं अपनी पहली तैनाती में था। जिस तरह से ओसामा बिन लादेन का नाम हमले में लिया जा रहा था, मैने सोचा कि मेरी यूनिट को अगले ही दिन अफगानिस्तान जाने का आदश मिलेगा। पिछले डेढ़ सालों से तैनाती के लिए हमारी तैयारी चल रही थी।

हमारी ट्रेनिंग, थाइलैंड, फिलिपिन्स, ईस्ट तिमोर, और ऑस्ट्रेलिया में पिछले कई हफ्तों तक होती रही। टीवी में हमले की तस्वीर देखते-देखते ऐसा लगा कि मैं ओकिनावा से अफगानिस्तान पहुंच गया और वहां अलकायदा के हमलावरों के पड़ा हूं। लेकिन, अफगानिस्तान जाने का आदेश हमें कभी नहीं मिला। मैं फ्रस्ट्रेट हो गया था। मैंने इतनी लंबी और मुश्किल ट्रेनिंग इसलिए नहीं ली थी, कि सील बन जाउं और फिर टीवी पर हमले का दृश्य देखूं। लेकिन अपना फ्रस्ट्रेशन मैने अपनी परिवार या मित्रों पर जाहिर होने नहीं दिया। वे मुझसे पूछते थे कि मैं अफगानिस्तान जा रहा था या नहीं। उनके लिए मैं एक सील था और वे सोचते थे कि तुरंत ही मेरी तैनाती अफगानिस्तान में हो जाएगी।

मुझे याद है जब मैने अपनी गर्लफ्रेंड को ई-मेल भेजा था और जिसमें मैने उस समय के खराब हालात को समझाने की कोशिश की थी। हम वर्तमान तैनाती के खत्म होने की बात कर रहे थे, जिसके बाद मुझे घर जाने का मौका मिलता और मुझे अगली तैनाती तक घर में रहने का मौका पाता। "मुझे एक महीने का मौका मिला है”, मैने लिखा। "मैं जल्द ही घर आउंगा अगर मुझे बिन लादेन को मारने को ना कहा जाए”। यह एक ऐसा मजाक था जो उन दिनों कई बार सुनने को मिलता था।

और अब जबकि ब्लैक हॉक हमारे लक्ष्य की ओर उड़ चला था, मैं पिछले दस वर्षों के बारे में सोचने लगा। जबसे हमला हुआ था, हमारे क्षेत्र में काम करनेवाला सभी लोग इस तरह के अभियान में शामिल होने का सपना देखा करता था।

उस दौर में वे सब जिनसे हम लड़ते थे, कहीं न कहीं अलकायदा लीडर से प्रभावित होते थे। वो लोगों को जहाज बिल्डिंग में टकराने के लिए प्रेरित करने में सक्षम था। इस तरह का फनैटसिटम डरावना होता है, और जैसा कि मैने देखा, ट्विन टावर्स ध्वस्त हो गए, और फिर वाशिंगटन डीसी और पेनिनसेल्वेनिया में हमले की खबर आई। मैं समझ गया कि हम अब युद्द में हैं, एक ऐसा युद्द जिसे हमने नहीं चुना है। बहुत सारे बहादुर लोगों ने वर्षों तक युद्ध करते हुए अपने बलिदान दिए, उन्हें इसका जरा भी अंदाजा नहीं था कि हम उस अभियान का हिस्सा कभी बन पाएंगे जो अब शुरू होनेवाला था।

हमले के एक दशक बाद, और लगभग पिछले आठ वर्षों तक अलकायदा के लड़ाकों को खोज-खोजकर मारने के बाद, हम बिन लादेन के कम्पाउंड में रस्सी के सहारे प्रवेश करने से कुछ मिनट की दूरी पर थे। हेलिकॉप्टर में बंधी रस्सी को पकड़ते वक्त मुझे मेरे पैर के अंगुठे में रक्तप्रवाह होने का एहसास हुआ।

मुझे से पहले एक स्निपर था, जिसका एक पैरा हेलिकॉप्टर के बाहर लटक रहा था और दूसरा अंदर, ताकि हेलिकॉप्टर से बाहर निकलने के रास्ते में अधिक कमांडोस आ सकें। उसके हथियार का बैरल कंपाउंड में अपना शिकार तलाश रहा था। कंपाउंड के दक्षिणी हिस्से को कवर करने का काम उसका था ताकि, असॉल्ट टीम रस्सी के सहारे आंगन में उतर सकें और अपने-अपने हिस्से के कार्यों को पूरा करने के लिए अलग-अलग दिशा में बढ़ें।

एक-आध दिन पहले तक हममें से किसी को यह भरोसा नहीं था कि वाशिंगटन इस अभियान को अपनी मंजूरी देगा। लेकिन कई हफ्तों के इंताजर के बाद, हम कंपाउंड से अब कुछ ही मिनटों की दूरी पर थे। खूफिया एजेंसियों के मुताबिक, हमारा लक्ष्य इसी कंपाउंड में होगा। मुझे ऐसा लगा कि वह यहां होगा। लेकिन, कुछ भी हो सकता था और इसमें आश्चर्य करने का प्रश्न ही नहीं था।

हमें पहले भी एक-दो बार ऐसा लगा था कि हम काफी करीब हैं। मैं 2007 में भी, कथित बिना लादेन के पीछे एक हफ्ते तक रह चुका था। हमें सूचना मिली थी कि, वह पाकिस्तान से हमेशा के लिए फिर से अफगानिस्तान आ रहा था। एक सोर्स ने बताया था कि उसने एक सफेद पोशाक वाले व्यक्ति को पहाड़ों में देखा था। लेकिन कई हफ्तों तक उसके पीछे भागने के बाद, पूरा अभियान निरर्थक निकला।


लेकिन इस बार का अभियान अलग था। हमारे रवाना होने से पहले, CIA की एक विश्लेषक, जो अबोटाबाद के लक्ष्य को ट्रैक करने के पीछे मुख्य ताकत थीं, ने बताया कि वे 100 फीसदी सुनिश्चित थीं, कि वह वहीं था। लेकिन अब यह महत्व नहीं रखता था। हम उस घर से कुछ सेकंड की दूरी पर थे, और जो कोई भी उस घर में था, उसपर ये रात काफी भारी परने वाली थी।

मिशन ओसामा में शामिल अमेरिकन नेवी सील कमांडर मार्क ओवेन (छद्म नाम) की किताब No Easy Day से साभार


अनुवाद: मनीष 

Friday, October 20, 2017

भारतीय बाजार में फ्लिपकार्ट ने अमेजन को पछाड़ा

दशहरा से लेकर दिवाली तक का समय भारतीय बाजार में खरीदारी का होता है। इस दौरान लोग जमकर खरीदारी करते हैं। पारंपरिक बाजार में आमतौर पर इस अवधि में कीमतें, चाहे कपड़े हों या खिलौने, काफी बढ़ जाती है। इस मौके का फायदा उठाने के लिए आधुनिक ऑनलाईन बाजार जैसे कि अमेजन, फ्लिपकार्ट दामों में कटौति कर उपभोक्ताओं को लुभाने की कोशिश करते हैं।

यूं तो कई सारी कंपनिया ऑनलाईन बाजार की ओर बढ़ रही हैं लेकिन भारत में कंपटिशन की बात करें तो अमेजन, फ्लिपकार्ट और स्नैपडील मुख्य हैं। स्नैपडील धीरे-धीरे लड़ाई में पिछड़ता नजर आ राह है। इसका फायदा उठाने के लिए अमेजन-फ्लिपकार्ट जमकर पसीना बहा रहे हैं।

2017 के फेस्टीवल सीजन में फ्लिपकार्ट फिर से लीडिंग पोजिसन में आ गई है। दशहरे से लेकर दिवाली तक के सेल में फ्लिपकार्ट नें अमेजन को जबरदस्त पटकनी दी है। वर्ष 2016 में भी फिल्पकार्ट आगे रहा था। इस साल ऑनलाईन सेल में फ्लिपकार्ट का हिस्सा 58 प्रतिशत रहा जबकि अमेजिन सिर्फ 26 फीसदी हिस्सेदारी ले पाया।



Thursday, January 5, 2017

दोस्त या दुश्मन

कुछ और सोचा था लिखने को कि तभी इस ब्लाॉग के पिछले पोस्ट पर नजर गयी। टाटा-मिस्त्री....। इससे अधिक कुछ और मुश्किल नहीं होता है।

संबंधों की जटिलता से। अपने मित्रों को देखता हूं। चोर-उचक्का से लेकर देवता तुल्य व्यक्ति भी सूचि में शामिल हैं।

दोस्तों को देखते-देखते ध्यान उन लोगों पर जाता है जो आपके दुश्मनों की सूचि में हैं। लेकिन यह क्या... इसमें भी सिर्फ बुरे नहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पूज्य हैं।

कुछ बात समझ में आयी। दोस्त और दुश्मन होने के लिए अच्छा या बुरा होना काफी नहीं है। कोई मन को भा गया तो दोस्त बन गया और नहीं भाया तो देवता तुल्य लोग भी आपके दुश्मनों में शामिल हो गए......

कुछ लोगों के लिए अफसोस होता है। उन्हें तो आपके दोस्तों में होना चाहिए था... वे तो आपके दोस्त थे.. फिर दुश्मन कैसे हो गए। यही बात आपके बस में नहीं होती.....।

ये सारी बातें इसलिए जहन में आयी कि एक मित्रवत अग्रज अचानक दूर हो गए। गलती मेरी थी... मैंने उनकी अच्छाइयों को हमेशा हलके में लिया...। सोचा वे तो हमेशा साथ रहेंगे...। लेकिन अब समझ में आई कि नहीं ऐसा नहीं होता है... । आपको अपनों का ख्याल रखना होता है। 

Thursday, December 8, 2016

क्यों टाटा के रतन से आंखों का कांटा बन गए मिस्त्री




हम साथ-साथ थे
जो लोग कॉरपोरेट इंडिया को नजदीक से फॉलो करते हैं उनके लिए साइरस मिस्त्री का टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त होना कल की ही बात है। रतन टाटा ने महीनों तो साइरस मिस्त्री को राजनेताओं से मुलाकात करवाने में बिता दिए। अखबारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपती थी। रतन टाटा साइरस मिस्त्री के  साथ फलां-फलां नेता से मिलने  जाते हुए.. कभी आते हुए। 


वजह साफ थी... लोगों का जो सपोर्ट टाटा संस को मिल रहा था... वो रतन टाटा के जाने के बाद और साइरस मिस्त्री के आने के बाद भी जारी रहे। ताकि साइरस मिस्त्री सफलतापूर्वक टाटा संस की लीगेसी को बढ़ाते रहें। 


PM के साथ टाटा और मिस्त्री

लेकिन कुछेक वर्षों में ही सबकुछ बदल गया। टाटा और मिस्त्री एक-दूसरे के कारोबारी खून के प्यासे हो गए। 

 ब्रांड का पर्याय है टाटा। सबकुछ बदल गया लेकिन लोगों का टाटा से भरोसा कभी नहीं बदला। मीडिया में बड़े वाक्यांस बने हैं टाटा संस के लिए.... सूई से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाली कंपनी या फिर नमक से लेकर जहाज तक बनाने वाली कंपनी जो सम्मान, स्नेह और रुतबा टाटा ब्रांड को हासिल है.... देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस आस-पास कहीं नहीं है। कभी किसी विवादों में नहीं रही यह कंपनी। लेकिन फिर अचानक क्या हो गया कि यह कपनी विवादों में ही नहीं उलझी बल्कि मीडिया में बयानो को देखे तो ऐसा लगता है रतन टाटा और साइरस मिस्त्री में से एक के बर्बाद होने के बाद ही यह जंग समाप्त होगी। 
 
मिस्त्री को झारखंड के तत्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा से मिलाते टाटा

इकोनोमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट की माने तो सायरस मिस्त्री ग्रुप उडीशा में विधानसभा चुनाव के लिए चंदा दना चाहता था। जबकि टाटा समूह हमेशा से सिर्फ संसदीय चुनाव के लिए फंडिग करता था। यह बाद रतन टाटा को बहुत नागवार गुजरी। 

एक डिफेंस कॉन्ट्रेक्ट हासिल करने के लिए साइरस की अगुवाई में टाटा सस ने अपनी दो कंपनियों की ओर से दो बोली लगाई। जबकि रतन टाटा पूरे समूह की ओर से सिर्फ एक बोली चाहते थे। 

कहा जाता है कि रतन टाटा के सबसे प्रिय प्रोजेक्ट नैनो को साइरस बंद करना चाहते थे.. रतन टाटा को इस पर कड़ी आपत्ती थी।  टाटा-डोकोमो विवाद को जिस तरीके से मिस्त्री ने हैंडल किया रतन टाटा उससे भी नाराज थे। इसके अतिरिक्त जिस तरह से मुंबई में बैठे-बैठे मिस्त्री मजदूरों के मामले को देखते थे टाटा उससे खुस नहीं थे। टाटा चाहते थे कि यह समूह मजदूरों के मेहनत से बना है और इसलिए समूह के मुखिया को वर्करों के बीच में जाकर उनके मामलों को देखना चाहिए।

Thursday, November 24, 2016

दुश्मनो को मिट्टी में मिला देंगे ये....


देश के दुश्मनों की अब खैर नहीं है। उनसे निपटने के लिए एक विशेष सुरक्षा दस्ते का गठन किया जा रहा है। यह एक ऐसा दस्ता होगा जो पलक झपकते ही दुश्मनों को नेश्तनाबूत कर देगा।
हरियाणा के मानेसर स्थित NSG का मुख्यालय

आतंकवादियों से निपटने के लिए 1984 में NSG यानि की राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड का गठन किया गया था। देस के सभी सुरक्षा बलों से जाबांजो को चुनकर NSG में विशेष ट्रेनिंग देकर दी जाती है। इस बल का काम है आतंकी हमला होने की सुरत में त्वरित कार्रवाई करके आतंकियों का खात्मा करना।

दुनिया के चोटी के आंतकवादरोधी दस्ते में NSG का नाम शामिल है। यहां तक की NSG की ट्रेंनिंग में अमेरिका के आतंकवाद विरोधी विशेष बल भी अपना सहयोग देती है ताकि भारत आतंक की वैश्विक चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सके।

और अब तैयार हो रहे हैं फैंटम कमांडोस। जी हां.... फैंटम मतलब चलता-फिरता प्रेत। अदृश्य रहते हुए अपने दुश्मनों का खात्मा कर देना फैंटम कमांडोस का काम है। NSG की ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उनके जाबांज कमांडो को चुनकर फैंटम कमांडोस में शामिल किया जाता है। NSG से अलग कर इन्हें किसी गुप्त जगह पर 9 महीने की और ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद तैयार होते हैं फैंटम कमांडो। फैंटम कमांडो को दुनिया की आधुनिकतम रक्षा तकनीक और हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती है।

अपने दुश्मनों को ये पलक झपकते ही समाप्त करने की क्षमता रखते हैं। जिस तेजी से देश विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है उसी तैजी से देश के सामने चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों में आतंकवाद सबसे प्रमुख है। दुश्मन देश हमेशा इस फिराक में रहता है कि कब मौका मिले  और देश को आतंक की आग में झोंक दें। ऐसे में दुश्मनों से निपटने में फैंटम बहुत कारकर साबित होंगे।

अपनी कठिन ट्रेनिंग की बदौलत NSG के कमांडोस कई ऑपरेशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुके हैं। अब उनके विशिष्ट साथियों को लेकर बनाया जा रहा फैंटम निश्चित दौर पर देश की सुरक्षा को और मजबूती प्रदान करेगा। 

Tuesday, November 15, 2016

जनादेश को स्वीकारना सीखिए जनाब..

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप जीत गए। हिलेरी क्लिंटन हार गईं। दुनिया भर में तहलका मच गया। क्यों भई, ये हंगामा क्यों!!!! ट्रंप सुल्तान को सुल्तान की गद्दी तो नहीं  मिली। ना ही उन्हें अपने पिता से राजशाही मिली है। उन्हें तो अमेरिका की जनता ने चुना है, उन्होंने हिलेरी क्लिंटन को चुनाव में धमाकेदार तरीके से हराकर राष्ट्रपति पद हासिल की। फिर ये हंगामा क्यों।

हंगामा इसलिए... कि कुछ लोग दुनियाभर में समझदारी की ठेकेदारी चलाते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े समझदार वे ही हैं। वे सोचते हैं कि जिनका समर्थन वे करते हैं... उस व्यक्ति को ही चुनाव जीतने चाहिए। जिसका विरोध वे करते हैं.. उसे हार जाना चाहिए। चलिए यहां तक तो ठीक है। समझदारी का उनका स्तर इस हद तक पहुंच गया कि वे जनता के चुने हुए नेता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रहे।

अमेरिका को देखिए.. ट्रंप की जीत से कुछ लोग इतने बौखला गए कि वे विरोध में सड़कों पर उतर आए। जरा अंतर देखिए...  होता अमूमन ये है कि जीत से उत्साहित होकर विजयी पार्टी के लोग सड़कों पर उतर कर जश्न मनाते हैं.. और यहां विरोधी सड़क पर उतर ट्रंप की जीत को मानने से इनकार कर देते हैं।

चुनाव से पहले 100 फीसदी गारंटी के साथ ऐसे ही समझदार बुद्दिजीवी जोर-शोर से घोषणा कर रहे थे कि हिलेरी की जीत पक्की है। ट्रंप के लिए मर्शिया पढ़ दिया गया था। लेकिन उनकी सारी भविष्यवाणी धरी की धरी रह गई। अमेरिकी जनता ने बता दिया कि फैसले सिर्फ जनता लेती है.. बुद्धिजीवी नहीं। आपको यह सारा खेल भारत से मिलता-जुलता लग सकता है।

ट्रंप जीत गए, हिलेरी हार गईं। ट्रंप के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन हो गए। लेकिन बस इतना कुछ इन बुद्धिजिवियों को काफी नहीं लगा। इन बुद्धिजिवियों का अगल स्तर देखिए... फिर से भविष्यवाणी पर उतर आए..।  कोई कहता है ट्रंप अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। कोई कहता है ट्रंप को महाभियोग लगाकर हटा दिया जाएगा। कोई कुछ, कोई कुछ। कहने का मतलब यह है कि वे किसी कीमत पर ट्रंप को पचाने के लिए राजी नहीं हैं।


लोकतंत्र के जो ये ठेकेदारी लिए तथाकथित बुद्धिजीवी बैठे हैं... उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है।  ये कुछ और नहीं बल्कि लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इन्हें सिर्फ जीत चाहिए। इनके शब्दकोश में लोकतंत्र का मतलब सिर्फ जीत होता है और कुछ नहीं।  असल में ये लोग लोकतांत्रिक नहीं हैं। ऐसे लोग एक बार नहीं बार- हारेंगे। क्योंकि जो दूसरे की जीत का सम्मान नहीं जानता है उसे स्वयं भी जीतने का हक नहीं होता है।