Daily Horoscopes

Thursday, January 5, 2017

दोस्त या दुश्मन

कुछ और सोचा था लिखने को कि तभी इस ब्लाॉग के पिछले पोस्ट पर नजर गयी। टाटा-मिस्त्री....। इससे अधिक कुछ और मुश्किल नहीं होता है।

संबंधों की जटिलता से। अपने मित्रों को देखता हूं। चोर-उचक्का से लेकर देवता तुल्य व्यक्ति भी सूचि में शामिल हैं।

दोस्तों को देखते-देखते ध्यान उन लोगों पर जाता है जो आपके दुश्मनों की सूचि में हैं। लेकिन यह क्या... इसमें भी सिर्फ बुरे नहीं कुछ ऐसे लोग भी हैं जो पूज्य हैं।

कुछ बात समझ में आयी। दोस्त और दुश्मन होने के लिए अच्छा या बुरा होना काफी नहीं है। कोई मन को भा गया तो दोस्त बन गया और नहीं भाया तो देवता तुल्य लोग भी आपके दुश्मनों में शामिल हो गए......

कुछ लोगों के लिए अफसोस होता है। उन्हें तो आपके दोस्तों में होना चाहिए था... वे तो आपके दोस्त थे.. फिर दुश्मन कैसे हो गए। यही बात आपके बस में नहीं होती.....।

ये सारी बातें इसलिए जहन में आयी कि एक मित्रवत अग्रज अचानक दूर हो गए। गलती मेरी थी... मैंने उनकी अच्छाइयों को हमेशा हलके में लिया...। सोचा वे तो हमेशा साथ रहेंगे...। लेकिन अब समझ में आई कि नहीं ऐसा नहीं होता है... । आपको अपनों का ख्याल रखना होता है। 

Thursday, December 8, 2016

क्यों टाटा के रतन से आंखों का कांटा बन गए मिस्त्री




हम साथ-साथ थे
जो लोग कॉरपोरेट इंडिया को नजदीक से फॉलो करते हैं उनके लिए साइरस मिस्त्री का टाटा संस का चेयरमैन नियुक्त होना कल की ही बात है। रतन टाटा ने महीनों तो साइरस मिस्त्री को राजनेताओं से मुलाकात करवाने में बिता दिए। अखबारों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें छपती थी। रतन टाटा साइरस मिस्त्री के  साथ फलां-फलां नेता से मिलने  जाते हुए.. कभी आते हुए। 


वजह साफ थी... लोगों का जो सपोर्ट टाटा संस को मिल रहा था... वो रतन टाटा के जाने के बाद और साइरस मिस्त्री के आने के बाद भी जारी रहे। ताकि साइरस मिस्त्री सफलतापूर्वक टाटा संस की लीगेसी को बढ़ाते रहें। 


PM के साथ टाटा और मिस्त्री

लेकिन कुछेक वर्षों में ही सबकुछ बदल गया। टाटा और मिस्त्री एक-दूसरे के कारोबारी खून के प्यासे हो गए। 

 ब्रांड का पर्याय है टाटा। सबकुछ बदल गया लेकिन लोगों का टाटा से भरोसा कभी नहीं बदला। मीडिया में बड़े वाक्यांस बने हैं टाटा संस के लिए.... सूई से लेकर सॉफ्टवेयर तक बनाने वाली कंपनी या फिर नमक से लेकर जहाज तक बनाने वाली कंपनी जो सम्मान, स्नेह और रुतबा टाटा ब्रांड को हासिल है.... देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस आस-पास कहीं नहीं है। कभी किसी विवादों में नहीं रही यह कंपनी। लेकिन फिर अचानक क्या हो गया कि यह कपनी विवादों में ही नहीं उलझी बल्कि मीडिया में बयानो को देखे तो ऐसा लगता है रतन टाटा और साइरस मिस्त्री में से एक के बर्बाद होने के बाद ही यह जंग समाप्त होगी। 
 
मिस्त्री को झारखंड के तत्कालीन सीएम अर्जुन मुंडा से मिलाते टाटा

इकोनोमिक्स टाइम्स की एक रिपोर्ट की माने तो सायरस मिस्त्री ग्रुप उडीशा में विधानसभा चुनाव के लिए चंदा दना चाहता था। जबकि टाटा समूह हमेशा से सिर्फ संसदीय चुनाव के लिए फंडिग करता था। यह बाद रतन टाटा को बहुत नागवार गुजरी। 

एक डिफेंस कॉन्ट्रेक्ट हासिल करने के लिए साइरस की अगुवाई में टाटा सस ने अपनी दो कंपनियों की ओर से दो बोली लगाई। जबकि रतन टाटा पूरे समूह की ओर से सिर्फ एक बोली चाहते थे। 

कहा जाता है कि रतन टाटा के सबसे प्रिय प्रोजेक्ट नैनो को साइरस बंद करना चाहते थे.. रतन टाटा को इस पर कड़ी आपत्ती थी।  टाटा-डोकोमो विवाद को जिस तरीके से मिस्त्री ने हैंडल किया रतन टाटा उससे भी नाराज थे। इसके अतिरिक्त जिस तरह से मुंबई में बैठे-बैठे मिस्त्री मजदूरों के मामले को देखते थे टाटा उससे खुस नहीं थे। टाटा चाहते थे कि यह समूह मजदूरों के मेहनत से बना है और इसलिए समूह के मुखिया को वर्करों के बीच में जाकर उनके मामलों को देखना चाहिए।

Thursday, November 24, 2016

दुश्मनो को मिट्टी में मिला देंगे ये....


देश के दुश्मनों की अब खैर नहीं है। उनसे निपटने के लिए एक विशेष सुरक्षा दस्ते का गठन किया जा रहा है। यह एक ऐसा दस्ता होगा जो पलक झपकते ही दुश्मनों को नेश्तनाबूत कर देगा।
हरियाणा के मानेसर स्थित NSG का मुख्यालय

आतंकवादियों से निपटने के लिए 1984 में NSG यानि की राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड का गठन किया गया था। देस के सभी सुरक्षा बलों से जाबांजो को चुनकर NSG में विशेष ट्रेनिंग देकर दी जाती है। इस बल का काम है आतंकी हमला होने की सुरत में त्वरित कार्रवाई करके आतंकियों का खात्मा करना।

दुनिया के चोटी के आंतकवादरोधी दस्ते में NSG का नाम शामिल है। यहां तक की NSG की ट्रेंनिंग में अमेरिका के आतंकवाद विरोधी विशेष बल भी अपना सहयोग देती है ताकि भारत आतंक की वैश्विक चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सके।

और अब तैयार हो रहे हैं फैंटम कमांडोस। जी हां.... फैंटम मतलब चलता-फिरता प्रेत। अदृश्य रहते हुए अपने दुश्मनों का खात्मा कर देना फैंटम कमांडोस का काम है। NSG की ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उनके जाबांज कमांडो को चुनकर फैंटम कमांडोस में शामिल किया जाता है। NSG से अलग कर इन्हें किसी गुप्त जगह पर 9 महीने की और ट्रेनिंग दी जाती है। इसके बाद तैयार होते हैं फैंटम कमांडो। फैंटम कमांडो को दुनिया की आधुनिकतम रक्षा तकनीक और हथियारों की ट्रेनिंग दी जाती है।

अपने दुश्मनों को ये पलक झपकते ही समाप्त करने की क्षमता रखते हैं। जिस तेजी से देश विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है उसी तैजी से देश के सामने चुनौतियां भी बढ़ रही हैं। इन चुनौतियों में आतंकवाद सबसे प्रमुख है। दुश्मन देश हमेशा इस फिराक में रहता है कि कब मौका मिले  और देश को आतंक की आग में झोंक दें। ऐसे में दुश्मनों से निपटने में फैंटम बहुत कारकर साबित होंगे।

अपनी कठिन ट्रेनिंग की बदौलत NSG के कमांडोस कई ऑपरेशनों को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुके हैं। अब उनके विशिष्ट साथियों को लेकर बनाया जा रहा फैंटम निश्चित दौर पर देश की सुरक्षा को और मजबूती प्रदान करेगा। 

Tuesday, November 15, 2016

जनादेश को स्वीकारना सीखिए जनाब..

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप जीत गए। हिलेरी क्लिंटन हार गईं। दुनिया भर में तहलका मच गया। क्यों भई, ये हंगामा क्यों!!!! ट्रंप सुल्तान को सुल्तान की गद्दी तो नहीं  मिली। ना ही उन्हें अपने पिता से राजशाही मिली है। उन्हें तो अमेरिका की जनता ने चुना है, उन्होंने हिलेरी क्लिंटन को चुनाव में धमाकेदार तरीके से हराकर राष्ट्रपति पद हासिल की। फिर ये हंगामा क्यों।

हंगामा इसलिए... कि कुछ लोग दुनियाभर में समझदारी की ठेकेदारी चलाते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया के सबसे बड़े समझदार वे ही हैं। वे सोचते हैं कि जिनका समर्थन वे करते हैं... उस व्यक्ति को ही चुनाव जीतने चाहिए। जिसका विरोध वे करते हैं.. उसे हार जाना चाहिए। चलिए यहां तक तो ठीक है। समझदारी का उनका स्तर इस हद तक पहुंच गया कि वे जनता के चुने हुए नेता को स्वीकार करने को तैयार नहीं हो रहे।

अमेरिका को देखिए.. ट्रंप की जीत से कुछ लोग इतने बौखला गए कि वे विरोध में सड़कों पर उतर आए। जरा अंतर देखिए...  होता अमूमन ये है कि जीत से उत्साहित होकर विजयी पार्टी के लोग सड़कों पर उतर कर जश्न मनाते हैं.. और यहां विरोधी सड़क पर उतर ट्रंप की जीत को मानने से इनकार कर देते हैं।

चुनाव से पहले 100 फीसदी गारंटी के साथ ऐसे ही समझदार बुद्दिजीवी जोर-शोर से घोषणा कर रहे थे कि हिलेरी की जीत पक्की है। ट्रंप के लिए मर्शिया पढ़ दिया गया था। लेकिन उनकी सारी भविष्यवाणी धरी की धरी रह गई। अमेरिकी जनता ने बता दिया कि फैसले सिर्फ जनता लेती है.. बुद्धिजीवी नहीं। आपको यह सारा खेल भारत से मिलता-जुलता लग सकता है।

ट्रंप जीत गए, हिलेरी हार गईं। ट्रंप के विरुद्ध विरोध प्रदर्शन हो गए। लेकिन बस इतना कुछ इन बुद्धिजिवियों को काफी नहीं लगा। इन बुद्धिजिवियों का अगल स्तर देखिए... फिर से भविष्यवाणी पर उतर आए..।  कोई कहता है ट्रंप अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे। कोई कहता है ट्रंप को महाभियोग लगाकर हटा दिया जाएगा। कोई कुछ, कोई कुछ। कहने का मतलब यह है कि वे किसी कीमत पर ट्रंप को पचाने के लिए राजी नहीं हैं।


लोकतंत्र के जो ये ठेकेदारी लिए तथाकथित बुद्धिजीवी बैठे हैं... उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है।  ये कुछ और नहीं बल्कि लोकतंत्र के सबसे बड़े दुश्मन हैं। इन्हें सिर्फ जीत चाहिए। इनके शब्दकोश में लोकतंत्र का मतलब सिर्फ जीत होता है और कुछ नहीं।  असल में ये लोग लोकतांत्रिक नहीं हैं। ऐसे लोग एक बार नहीं बार- हारेंगे। क्योंकि जो दूसरे की जीत का सम्मान नहीं जानता है उसे स्वयं भी जीतने का हक नहीं होता है।  

Tuesday, November 8, 2016

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया



अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में दो मुख्य उम्मीदवार हैं—रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप और डेमोक्रेट हिलैरी क्लिंटन। इनके अतिरिक्त कुछ दुसरे उम्मीदवार भी हैं । आज अमेरिका के 50 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के 18 वर्ष से अधिक के मतदाता वोट देंगे।

आम धारणा के उलट अमेरिकी जनता सीधे राष्ट्रपति को चुनाव नहीं करती। अमेरिकी मतदाता 8 नवंबर को अपने पसंदीदा राष्ट्रपति उम्मीदवार को वोट देते हैं। जिस उम्मीदवार को जिस अमेरिकी राज्य में सर्वाधिक वोट मिलेंगे उस राज्य के सभी इलेक्टर उसे मिल जाएंगे। यानी हर राज्य से किसी राष्ट्रपति पद के किसी एक उम्मीदवार को सारे इलेक्टर मिलते हैं। इसके बाद सभी राज्यों से चुने हुए इलेक्टर राष्ट्रपति चुनते हैं।  चूंकि लोकप्रिय वोटों की गिनती के साथ ही पता चल जाता है कि किस उम्मीदवार के पास कितने इलेक्टर हैं इसलिए ये साफ हो जाता है कि राष्ट्रपति कौन बनेगा लेकिन आधिकारिक तौर पर कोई उम्मीदवार राष्ट्रपति इलेक्टरों के मतदान के बाद ही बन पाता है।

इलेक्टरों की संख्या कैसे तय होती है? अमेरिका के 50 राज्यों और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के कुल 538 सदस्यों से इलेक्टर कॉलेज बनता है। इलेक्टर की संख्या हर राज्य के सांसदों के समानुपाती होती है। अमेरिका में हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव के 435 (जनसंख्या के आधार पर 1911 में निर्धारित की गई थीं) सदस्य हैं। सीनेट के 100 (हर राज्य का दो) सदस्य और डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के तीन। इस अनुपात में कुल 538 इलेक्टर चुने जाते हैं।

कौन हैं इलेक्टर? इलेक्टर राजनीतिक पार्टियों के सदस्य होते हैं। कोई सीनेटर या रिप्रजेंटेटिव या किसी भी सरकारी लाभ के पद पर आसीन व्यक्ति इलेक्टर नहीं बन सकता। हर पार्टी हर राज्य के लिए अपने इलेक्टर चुनती है। मसलन, इलिनॉय राज्य में डेमोक्रेटिक पार्टी के 20 इलेक्टर हैं और रिपब्लिकन के 20 और इसी तरह बाकी पार्टियों के।

इलेक्टर कैसे चुने जाते हैं? हर पार्टी चुनाव से पहले संभावित इलेक्टर चुनती है। हर राज्य में इलेक्टर चुनने की प्रक्रिया अलग-अलग होती है। हालांकि डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी जैसी पार्टियां या तो पार्टी की राज्य इकाई द्वारा नामित किए जाते हैं या पार्टी की केंद्रीय कमेटी उनका चुनाव करती है।

इलेक्टर कब चुनेंगे राष्ट्रपति? 18 दिसंबर को सभी इलेक्टर अपने-अपने राज्यों में वोट देंगे। जनवरी, 2017 में इलेक्टरों के वोट गिने जाएंगे। और 20 जनवरी 2017 को अमेरिका के नए राष्ट्रपति शपथ ग्रहण करेंगे।  अमेरिका में कुल 538 इलेक्टर हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार को कुल इलेक्टरों के आधे से अधिक वोट हासिल करने होते हैं।

अगर किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला तो? अगर किसी प्रत्याशी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव शीर्ष तीन प्रत्याशियों में से राष्ट्रपति का चुनाव करते हैं। सीनेट शीर्ष दो प्रत्याशियों में से उप-राष्ट्रपति का चुनाव करती है। अमेरिकी इतिहास में अभी तक केवल एक बार हाउस ऑफ रिप्रजेंटेटिव ने राष्ट्रपति चुना है। 1824 में क्विंकी एडम्स इस तरह राष्ट्रपति चुने गए थे।

क्या ज्यादा लोकप्रिय वोट पाने वाला प्रत्याशी हार भी सकता है? चूंकि अमेरिकी जनता सीधे राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं करती इसलिए जरूरी नहीं है कि ज्यादा लोकप्रिय वोट पाने वाला उम्मीदवार ही राष्ट्रपति बने। अगर किसी प्रत्याशी को किसी छोटे राज्य में जीत मिली है लेकिन बड़े राज्य में हार तो उसके मिलने वाले इलेक्टरों की संख्या कम हो जाएगी। इस तरह वो ज्यादा वोट पाने के बाद भी हार सकता है। मसलन, अगर कोई प्रत्याशी कैलिफोर्निया में चुनाव जीत जाता है तो उसे वहां के कुल 55 इलेक्टर मिल जाएंगे।

अमेरिकी इतिहास में अभी तक केवल चार बार ऐसा हुआ है कि कम लोकप्रिय वोट पाने वाला उम्मीदवार राष्ट्रपति बना। सबसे ताजा मामला साल 2000 का है जब जॉर्ज बुश ने अल गोर को कम वोट मिलने के बावजूद हरा दिया था क्योंकि उनके पास ज्यादा इलेक्टर थे।साभार: जनसत्ता

Wednesday, October 26, 2016

समाजवादी समीकरण

पिछले कई दशकों से समाजादी पार्टी उत्तर प्रदेश में अजेय बनी हुई है। अजेय का अर्थ यह नहीं कि इस दल ने चुनाव नहीं हारा। इसका मतलब यह कि इसके आधार वोटों में शायद ही कभी बिखराव देखा गया हो। लेकिन पहली बार इस पार्टी के अस्तित्व पर ही संकट आता नजर आ रहा है। शिवपाल के विरोध के बावजूद मुलायम सिंह ने अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाया। उद्देश्य साफ था पार्टी में पावर का हस्तांतरण मुलायम की अगली पीढ़ी में करना था। मुलायम की छत्रछाया में अखिलेश यादव को एक ऐसा कद विकसित करने का मौका उपलब्ध कराना था जहां वे स्वयं को सत्ता और पार्टी में निर्विवाद रुप से नेता के तौर पर स्थापित कर सकें।

कहां चूके अखिलेश?
लेकिन इस मौके का फायदा उठाने में अखिलेश चूक गए से दिखते हैं। अखिलेश मुख्यमंत्री हैं, पार्टी मुखिया के पुत्र हैं जाहिर है लोग उनके साथ तो रहेंगे ही। लेकिन इसमें उनके नेता होने का कम, मुख्यमंत्री और मुलायम पुत्र होने का योगदान अधिक है।
मुख्यमंत्री बनने के बाद के सालों में अखिलेश की सबसे बड़ी उपलब्धि होती अगर वो परिवार में स्वयं को मुलायम के उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित कर लेते। लेकिन अखिलेश ने किया इसक उलटा। उन्होंने अपने उस चाचा शिवपाल से झगड़ा मोल ले लिया जिनका समाजवादी पार्टी के विकास में मुलायम के बराबर ही तकरीबन योगदान है। शिवपाल का प्रदेश में अपना एक समर्थक वर्ग है। मुलायम इस बात को स्वयं भी बार-बार कहते रहे हैं  कि शिवपाल जमीनी नेता हैं जिनकी पकड़ पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता में अच्छी है। लेकिन समाजवादी परिवार, जिसे  मुलायम ने अपने परिवार के सभी सदस्यों, यादवों और मुस्लिम मतों के सहयोग से बनाया अचानक बिखड़ती नजर आ रही है।

शिवपाल होंगे कमजोर!
आप गलत सोच और पढ़ रहे हैं अगर आप यह सोचते हैं कि अखिलेश पार्टी को तोड़ देंगे। समय आने दीजिए.... पार्टी टूटेगी जरूरलेकिन तोड़ने वाले अखिलेश नहीं.. शिवपाल होगें। पिता-पुत्र पर भाई-भाई भारी नहीं पड़ा है। मुलायम की डांट सिर्फ एक पिता की डांट भर है। और अखिलेश इससे ज्यादा मुलायम की डांट को महत्व भी नहीं देते। भाई के अहसानों तले मुलायम दबे हैं और पुत्र नियंत्रण से बाहर जा चुका है।
निर्णय लेना मुलायम के लिए आसान नहीं है। भाई शिवपाल को दिलासा दे रहे हैं कि वे उनके साथ हैं लेकिन पुत्र के विरुद्ध कोई को कदम नहीं उठा रहे। रामगोपाल पार्टी से बाहर निकाल दिए गए... अखिलेश के विरुद्ध क्या कदम लिया??? कुछ नहीं।

पार्टी बैठक असफल
पिछले सोमवार, 24 अक्टूबर, को मुलायम ने पार्टी की बैठक बुलाई थी। सोचा कि पार्टी बनाने में हुई संघर्ष की कहानी सुनाकर अखिलेश और शिवपाल को एक कर देंगे। लेकिन हुआ इसका उलट। स्थिति और बिगड़ गई। अखिलेश-शिवपाल हाथापाई पर उतर आए। इतनी ही नहीं... अब मुलायम के हाथ में भी कुछ नहीं है। अगले दिन शिवपाल के साथ मुलायम ने मीडिया से बात की लेकिन अखिलेश नहीं आए। शिवपाल को वापस सरकार में लेने के मामले को उन्होंने मुख्यमंत्री पर छोड़ दिया। साफ है मुलायम कोशिश तो कर रहे हैं लेकिन पुत्र नियंत्रण से बाहर जा चुका है।

अमर सिंह
अमर सिंह तो बेचारे बेकार में बदनाम हो रहे हैं.... इस मैच के असली खिलाड़ी तो परिवार में ही हैं। वो चाहे रामगोपाल हों या फिर नेताजी की दूसरी पत्नी और उनके बच्चे। ये आग अमर सिंह के आने से नहीं  लगी है। अगर ऐसा हुआ होता तो इस स्तर तक नहीं पहुंचता कि सबके सामने मुख्यमंत्री अपने चाचा से भिर जाएं। सत्ता संघर्ष तो सपा की सरकार मं आते ही शुरू हो गई थी चुनाव की पूर्व संध्या पर असली लड़ाई है अपने अधिक से अधिक समर्थकों को टिकट दिलाना।

किसके पास क्या उपाय
मुख्यमंत्री अखिलेश की कोशिश अब पार्टी पर पकड़ बनाने की होगी। असली संघर्ष तब शुरू होगा जब टिकटों का बंटवारा शुरू होगा। मुलायम एक बार फिर से भाई और पुत्र के बीच में फंसेंगे और पुत्र का साथ देकर अपने कर्तव्यों की इतीश्री करेंगे। ऐसे में शिवपाल के लिए कुछ खास करने को नहीं बचेगा। वे अलग पार्टी बनाकर समाजवादी परिवार और वोट बैंक में विखराव कर सकते हैं। अमर सिंह की पारी अब समाप्त है। मुलायम और शिवपाल को छोड़कर उन्हें कोई पूछ नहीं रहा है। उनकी कोशिश होगी की सफलता पूर्वक राज्य सभा का कार्यकाल पूरा कर लें। रामगोपाल आनेवाले समय में अखिलेश के अमर साबित हो सकते हैं। इसलिए उन्होंने अपनी पूरी ताकत अखिलेश के पीछे झोंक दी है।